जावेद अख़्तर की कहानी उन्हीं की ज़ुबानी…

(जावेद साहब की इस कहानी को मैंने उनकी किताब ‘तरकश’ के ‘अपने बारे में’ कॉलम में पढ़ा और अपने मित्रों को भी पढ़ाया। कुछ ने बताया कि पढ़ते हुए उनकी आँखें गीली हो गईं। आप लोगों के समक्ष इसको रखने के लिए मैंने वो किताब फिर खोलकर पूरी कहानी टाइप की
और इस बात का ध्यान रखा कि जैसा अख़्तर साहब ने किताब में लिखा है वैसा ही टाइप करूँ। मैंने एक-एक नुक़्ते को भी उनकी किताब के अनुसार टाइप किया है। कोई बड़ी गलती हो गई हो तो सूचित कीजिएगा।
 जावेद साहब की कलम का जादू शुरू होता है अब…)

 

 

लोग जब अपने बारे में लिखते हैं तो सबसे पहले यह बताते हैं कि वो किस शहर के रहने वाले हैं-मैं किस शहर को अपना शहर कहूँ? . . .पैदा होने का जुर्म ग्वालियर में किया लेकिन होश सँभाला लखनऊ में, पहली बार होश खाया अलीगढ़ में, फिर भोपाल में रहकर कुछ होशियार हुआ लेकिन बम्बई आकर काफ़ी दिनों तक होश ठिकाने रहे, तो आइये ऐसा करते हैं कि मैं अपनी जि़न्दगी का छोटा सा फ़्लैश बैक बना लेता हूँ। इस तरह आपका काम यानी पढ़ना भी आसान हो जाएगा और मेरा काम भी, यानी लिखना।
शहर लखनऊ . . . किरदार-मेरे नाना, नानी दूसरे घरवाले और मैं. . . मेरी उम्र आठ बरस है। बाप बम्बई में है, माँ कब्र में। दिन भर घर के आँगन में अपने छोटे भाई के साथ क्रिकेट खेलता हूँ। शाम को ट्यूशन पढ़ाने के लिए एक डरावने से मास्टर साहब आते हैं। उन्हें पन्द्रह रुपए महीना दिया जाता है (यह बात बहुत अच्छी तरह याद है इसलिए कि रोज़ बताई जाती थी)। सुबह खर्च करने के लिए एक अधन्ना और शाम को एक इकन्नी दी जाती है, इसलिए पैसे की कोई समस्या नहीं है। सुबह रामजी लाल बनिए की दुकान से रंगीन गोलियां खरीदता हूँ और शाम को सामने फ़ुटपाथ पर ख़ोमचा लगाने वाले भगवती की चाट पर इकन्नी लुटाता हूँ। ऐश ही ऐश है। स्कूल खुल गए हैं। मेरा दाखि़ला लखनऊ के मशहूर स्कूल कॉल्विन ताल्लुक़ेदार कॉलेज में छटी क्लास में करा दिया जाता है। पहले यहाँ सिर्फ ताल्लुक़ेदारों के बेटे पढ़ सकते थे, अब मेरे जैसे कमज़ातों को भी दाखि़ला मिल जाता है। अब भी बहुत महँगा स्कूल है . . . मेरी फ़ीस सत्रह रुपये महीना है (यह बात बहुत अच्छी तरह याद है, इसलिए कि रोज़ . . . जाने दीजिए)। मेरी क्लास में कई बच्चे घड़ी बाँधते हैं। वो सब बहुत अमीर घरों के हैं। उनके पास कितने अच्छे-अच्छे स्वेटर हैं। एक के पास तो फाउन्टेन पेन भी है। यह बच्चे इन्टरवल में स्कूल की कैन्टीन से आठ आने की चॉकलेट ख़रीदते हैं (अब भगवती की चाट अच्छी नहीं लगती)। कल क्लास में राकेश कह रहा था उसके डैडी ने कहा है कि वो उसे पढ़ने के लिए इंग्लैंड भेजेंगे। कल मेरे नाना कह रहे थे . . . अरे कमबख़्त! मैट्रिक पास कर ले तो किसी डाकख़ाने में मोहर लगाने की नौकरी तो मिल जाएगी। इस उम्र में जब बच्चे इंजन ड्राइवर बनने का ख्वाब देखते हैं, मैंने फैसला कर लिया है कि बड़ा होकर अमीर बनूँगा . . .
शहर अलीगढ़ . . . किरदार-मेरी ख़ाला, दूसरे घरवाले और मैं. . . मेरे छोटे भाई को लखनऊ में नाना के घर में ही रख लिया गया है और मैं अपनी ख़ाला के हिस्से में आया हूँ जो अब अलीगढ़ आ गई हैं। ठीक ही तो है। दो अनाथ बच्चों को कोई एक परिवार तो नहीं रख सकता। मेरी ख़ाला के घर के सामने दूर जहाँ तक नज़र जाती है मैदान है। उस मैदान के बाद मेरा स्कूल है . . . नवीं क्लास में हूँ, उम्र चैदह बरस है। अलीगढ़ में जब सर्दी होती है तो झूठमूठ नहीं होती। पहला घंटा सात बजे होता है। मैं स्कूल जा रहा हूँ। सामने से चाकू की धार की जैसी ठंडी और नुकीली हवा आ रही है। छूकर भी पता नहीं चलता कि चेहरा अपनी जगह है या हवा ने नाक कान काट डाले हैं। वैसे पढ़ाई में तो नाक कटती ही रहती है। पता नहीं कैसे, बस, पास हो जाता हूँ। इस स्कूल में जिसका नाम मिंटो सर्किल है, मेरा दाखिला कराते हुए मेरे मौसा ने टीचर से कहा है . . . ख़्याल रखिएगा इनका, दिल पढ़ाई में कम फि़ल्मी गानों में ज़्यादा लगता है। दिलीप कुमार की उड़न खटोला, राजकपूर की श्री चार सौ बीस देख चुका हूँ। बहुत से फिल्मी गाने याद हैं, लेकिन घर में ये फि़ल्मी गाने गाना तो क्या, सुनना भी मना है इसलिए स्कूल से वापस आते हुए रास्ते में ज़ोर-ज़ोर से गाता हूँ (माफ़ कीजिएगा, जाते वक्त तो इतनी सर्दी होती थी कि सिर्फ़ पक्के राग ही गाए जा सकते थे)। मेरा स्कूल यूनिवर्सिटी एरिया में ही है। मेरी दोस्ती स्कूल के दो-चार लड़कों के अलावा ज़्यादातर यूनिवर्सिटी के लड़कों से है। मुझे बड़े लड़कों की तरह होटलों में बैठना अच्छा लगता है। अक्सर स्कूल से भाग जाता हूँ। स्कूल से शिकायतें आती हैं। कई बार घर वालों से काफ़ी पिटा भी, लेकिन कोई फ़र्क नहीं पड़ा, कोर्स की किताबों में दिल नहीं लगा तो नहीं लगा। लेकिन नॉवलें बहुत पढ़ता हूँ। डाँट पड़ती है लेकिन फिर भी पढ़ता हूँ। मुझे शे’र बहुत याद हैं। यूनिवर्सिटी में जब भी उर्दू शेरों की अंताक्षरी होती है, मैं अपने स्कूल की तरफ़ से जाता हूँ और हर बार मुझे बहुत से ईनाम मिलते हैं। यूनिवर्सिटी के सारे लड़के-लड़कियाँ मुझे पहचानते हैं। लड़के मुझे पहचानते हैं मुझे इसकी खुशी है; लड़कियाँ मुझे पहचानती हैं इसकी थोड़ी ज़्यादा ख़ुशी है। . . . अब मैं कुछ बड़ा हो चला हूँ . . . मैं पन्द्रह साल का हूँ और जि़न्दगी में पहली बार एक लड़की को ख़त लिख रहा हूँ, मेरा दोस्त बीलू मरी मदद करता है। हम दोनों मिलकर यह ख़त तैयार करते हैं। दूसरे दिन एक खाली बैडमिंटन कोर्ट में वह लड़की मुझे मिलती है और हिम्मत करके मैं यह ख़त उसे दे देता हूँ। यह मेरी जि़न्दगी का पहला और आखिरी प्रेम-पत्र है। (उस ख़त में क्या लिखा था, यह भूल गया लेकिन वो लड़की आज तक याद है)। मैट्रिक के बाद अलीगढ़ छोड़ रहा हूँ। मेरी ख़ाला बहुत रो रही हैं और मेरे मौसा उन्हें चुप कराने के लिए कह रहे हैं कि तुम तो इस तरह रो रही हो, जैसे यह भोपाल नहीं war front पर जा रहा हो (उस वक़्त न वो जानते थे, न मैं जानता था कि मैं सचमुच war front पर ही जा रहा था)।
शहर भोपाल . . . किरदार-अनगिनत मेहरबान, बहुत से दोस्त और मैं . . . अलीगढ़ से बम्बई जाते वक्त मेरे बाप ने मुझे भोपाल या यूँ कहिए आधे रास्ते में छोड़ दिया है। कुछ दिनों अपनी सौतेली माँ के घर में रहा हूँ। फिर वो भी छूट गया। सैफि़या कॉलेज में पढ़ता हूँ और दोस्तों के सहारे रहता हूँ। दोस्त जिनकी लिस्ट बनाने बैठूँ तो टेलीफोन डायरेक्ट्री से मोटी किताब बन जाएगी। आजकल मैं बी.ए. सैकेन्ड इयर में हूँ। अपने दोस्त एजाज़ के साथ रहता हूँ। किराया वो देता है। मैं तो बस रहता हूँ। वो पढ़ता है और ट्यूशन करके गुज़र करता है। सब दोस्त उसे मास्टर कहते हैं . . . मास्टर से मेरा किसी बात पर झगड़ा हो गया है। बातचीत बंद है इसलिए मैं आजकल उससे पैसे नहीं माँगता, सामने दीवार पर टँगी हुई उसकी पैंट में से निकाल लेता हूँ या वो बग़ैर मुझसे बात किए मेरे सिरहाने दो-एक रुपए रखकर चला जाता है।
मैं बी.ए. फाईनल में हूँ, यह इस कॉलेज में मेरा चौथा बरस है। कभी फ़ीस नहीं दी . . . कॉलेज वालों ने माँगी भी नहीं, यह शायद सिर्फ भोपाल में ही हो सकता है।
कॉलेज के कम्पाउंड में एक खाली कमरा, वो भी मुझे मुफ़्त में दे दिया गया है, जब क्लास ख़त्म हो जाती है तो मैं किसी क्लास रूम से दो बेंच उठाकर इस कमरे में रख लेता हूँ और उन पर अपना बिस्तर बिछा लेता हूँ। बाक़ी सब आराम से है बस बैंचों में खटमल बहुत हैं। जिस होटल में उधार खाता था वो मेरे जैसे मुफ़्तख़ोरों को खिला-खिलाकर बंद हो गया है। उसकी जगह जूतों की दुकान खुल गई है। अब क्या खाऊँ। बीमार हूँ, अकेला हूँ, बुख़ार काफ़ी है, भूख उससे भी ज़्यादा है। कॉलेज के दो लड़के, जिनसे मेरी मामूली सी जान पहचान है मेरे लिए टिफि़न में खाना लेकर आते हैं . . . मेरी दोनों से कोई दोस्ती नहीं है, फिर भी . . . अजीब बेवकूफ़ हैं, लेकिन मैं बहुत चालाक हूँ, उन्हें पता भी नहीं लगने देता कि इन दोनों के जाने के बाद मैं रोऊँगा। मैं अच्छा हो जाता हूँ। वो दोनों मेरे अच्छे दोस्त हो जाते हैं . . . मुझे कॉलेज में डिबेट बोलने का शौक़ हो गया है। पिछले तीन बरस से भोपाल रोटरी क्लब की डिबेट का इनाम जीत रहा हूँ। इंटर कॉलेज डिबेट की बहुत सी ट्राफि़याँ मैंने जीती हैं। विक्रम यूनिवर्सिटी की तरफ़ से दिल्ली यूथ फ़ेस्टिवल में भी हिस्सा लिया है। कॉलेज में दो पार्टियाँ हैं और एलेक्शन में दोनों पार्टियाँ मुझे अपनी तरफ़ से बोलने को कहती हैं . . . मुझे एलेक्शन से नहीं, सिर्फ बोलने से मतलब है इसलिए मैं दोनों तरफ़ से तक़रीर कर देता हूँ।

कॉलेज का यह कमरा भी जाता रहा। अब मैं मुश्ताक सिंह के साथ हूँ। मुश्ताक़ सिंह नौकरी करता है और पढ़ता है। वो कॉलेज की उर्दू एसोसिएशन का सद्र है। मैं बहुत अच्छी उर्दू जानता हूँ। वो मुझसे भी बेहतर जानता है। मुझे अनगिनत शेर याद हैं। उसे मुझसे ज़्यादा याद हैं। मैं अपने घर वालों से अलग हूँ। उसके घर वाले हैं ही नहीं। . . . देखिए हर काम में वो मुझसे बेहतर है। साल भर से वो मुझसे दोस्ती खाने कपड़े पर निभा रहा है यानी खाना भी वही खिलाता है और कपड़े भी वही सिलवाता है-पक्का सरदार है-लेकिन मेरे लिए सिग्रेट ख़रीदना उसकी जि़म्मेदारी है।

अब मैं कभी-कभी शराब भी पीने लगा हूँ-हम दोनों रात को बैठे शराब पी रहे हैं-वो मुझे पारटीशन और उस ज़माने के दंगों के कि़स्से सुना रहा है-वो बहुत छोटा था लेकिन उसे याद है-कैसे दिल्ली के क़रोल बाग़ में दो मुसलमान लड़कियों को जलते हुए तारकोल के ड्रम में डाल दिया गया था और कैसे एक मुसलमान लड़के को . . . मैं कहता हूँ, ‘‘मुश्ताक सिंह! तू क्या चाहता है जो एक घंटे से मुझे ऐसे किस्से सुना-सुनाकर मुस्लिम लीगी बनाने की कोशिश कर रहा है-ज़ुल्म की ये ताली तो दोनों हाथों से बजी थी-अब ज़रा दूसरी तरफ की भी तो कोई वारदात सुना।’’
मुश्ताक़ सिंह हँसने लगता है . . . ‘‘चलो सुना देता हूँ-जग बीती सुनाऊँ या आप बीती’’ मैं कहता हूँ ‘‘आपबीती’’ और वो जवाब देता है, ‘‘मेरा ग्यारह आदमियों का ख़ानदान था-दस मेरी आँखों के सामने क़त्ल किए गए हैं . . .’’
मुश्ताक़ सिंह को उर्दू के बहुत से शे’र याद हैं-मैं मुश्ताक़ सिंह के कमरे में एक साल से रहता हूँ। बस एक बात समझ में नहीं आती- ‘मुश्ताक सिंह तुझे उन लोगों ने क्यों छोड़ दिया? तेरे जैसे भले लोग चाहे किसी ज़ात किसी मज़हब में पैदा हों हमेशा सूली पर चढ़ाए जाते हैं-तू कैसे बच गया ?’ . . . आजकल वो ग्लासगो में हैं। जब हम दोनों अलग हो रहे थे तो मैंने उसका कड़ा उससे लेकर पहन लिया था और वह आज तक मेरे हाथ में है और जब भी उसके बारे में सोचता हूँ ऐसा लगता है कि वो मेरे सामने है और कह रहा है-
बहुत नाकामियों पर आप अपनी नाज़ करते हैं
अभी देखी कहाँ हैं, आपने नाकामियाँ मेरी
शहर बंबई . . . किरदार- फि़ल्म इंडस्ट्री, दोस्त, दुश्मन और मैं . . . 4 अक्टूबर 1964, मैं बंबई सेंट्रल पर उतरा हूँ। अब इस अदालत में मेरी ज़िंदगी का फ़ैसला होना है। बंबई आने के छह दिन बाद बाप का घर छोड़ना पड़ता है। जेब में सत्ताईस नए पैसे हैं। मैं खुश हूँ कि जि़न्दगी में कभी अट्ठाईस नए पैसे भी आ गए तो मैं फ़ायदे में रहूँगा और दुनिया घाटे में।
बंबई में दो बरस होने को आए, न रहने का ठिकाना है न खाने का। यूँ तो एक छोटी सी फि़ल्म में सौ रुपए महीने पर डॉयलॉग लिख चुका हूँ। कभी कहीं असिस्टेंट हो जाता हूँ, कभी एक-आध छोटा-मोटा काम मिल जाता है, अक्सर वो भी नहीं मिलता। दादर एक प्रोड्यूसर के ऑफि़स अपने पैसे माँगने आया हूँ, जिसने मुझे अपनी पिक्चर के कॉमेडी सीन लिखवाए थे। ये सीन उस मशहूर राइटर के नाम से ही फि़ल्म में आएँगे जो ये फि़ल्म लिख रहा है। ऑफि़स बंद है। वापस बांदरा जाना है जो काफ़ी दूर है। पैसे बस इतने हैं कि या तो बस का टिकट ले लूँ या कुछ खा लूँ, मगर फिर पैदल वापस जाना पड़ेगा। चने ख़रीदकर जेब में भरता हूँ और पैदल सफ़र शुरू करता हूँ। कोहेनूर मिल्ज़ के गेट के सामने से गुज़रते हुए सोचता हूँ कि शायद सब बदल जाए लेकिन ये गेट तो रहेगा। एक दिन इसी के सामने से अपनी कार में गुज़रूँगा। एक फि़ल्म में डॉयलॉग लिखने का काम मिला है। कुछ सीन लिखकर डायरेक्टर के घर जाता हूँ। वो बैठा नाश्ते में अनानास खा रहा है, सीन लेकर पढ़ता है और सारे काग़ज़ मेरे मुँह पर फेंक देता है और फि़ल्म से निकालते हुए मुझे बताता है कि मैं ज़िंदगी में कभी राइटर नहीं बन सकता। तपती धूप में एक सड़क पर चलते हुए मैं अपनी आँख के कोने में आया एक आँसू पोछता हूँ और सोचता हूँ कि मैं एक दिन इस डायरेक्टर को दिखाऊँगा कि मैं . . . फिर जाने क्यों ख़्याल आता है कि क्या ये डायरेक्टर नाश्ते में रोज़ अनानास खाता होगा।
. . .रात के शायद दो बजे होंगे। बंबई की बरसात, लगता है आसमान से समंदर बरस रहा है। मैं खार स्टेशन के पोर्टिको की सीढि़यों पर एक कमज़ोर से बल्ब की कमज़ोर सी रोशनी में बैठा हूँ। पास ही ज़मीन पर इस आँधी-तूफ़ान से बेख़बर तीन आदमी सो रहे हैं। दूर कोने में एक भीगा हुआ कुत्ता ठिठुर रहा है। बारिश लगता है अब कभी नहीं रुकेगी। दूर तक ख़ाली अँधेरी सड़कों पर मूसलाधार पानी बरस रहा है। ख़ामोश बिल्डिंगों की रौशनियाँ कब की बुझ चुकी हैं। लोग अपने-अपने घरों में सो रहे होंगे। इसी शहर में मेरे बाप का भी घर है। बंबई कितना बड़ा शहर है और मैं कितना छोटा हूँ, जैसे कुछ भी नहीं हूँ। आदमी कितनी भी हिम्मत रखे कभी-कभी बहुत डर लगता है।
. . . मैं अब साल भर से कमाल स्टूडियो (जो कि अब नटराज स्टूडियो है) में रहता हूँ। कम्पाउंड में कहीं भी सो जाता हूँ। कभी किसी बरामदे में, कभी किसी पेड़ के नीचे, कभी किसी बेंच पर, कभी किसी कॉरीडोर में। यहाँ मेरे जैसे और कई बेघर और बेरोज़गार इसी तरह रहते हैं। उन्हीं में से एक जगदीश है, जिससे मेरी अच्छी दोस्ती हो जाती है। वो रोज़ एक नई तरकीब सोचता है कि आज खाना कहाँ से और कैसे मिल सकता है, आज दारू कौन और क्यों पिला सकता है। जगदीश ने बुरे हालात में जि़न्दा रहने को एक आर्ट बना लिया है।
मेरी जान-पहचान अँधेरी स्टेशन के पास फुटपाथ पर एक सेकंड हैंड किताब बेचने वाले से हो गई है। इसलिए किताबों की कोई कमी नहीं है। रात-रात-भर कम्पाउंड में जहाँ भी थोड़ी रौशनी होती है, वहीं बैठकर पढ़ता रहता हूँ। दोस्त मज़ाक़ करते हैं कि मैं इतनी कम रौशनी में अगर इतना ज़्यादा पढ़ता रहा तो कुछ दिनों में अंधा हो जाऊँगा . . . आजकल एक कमरे में सोने का मौक़ा मिल गया है। स्टूडियो के इस कमरे में चारों तरफ़ दीवारों से लगी बड़ी-बड़ी अलमारियाँ हैं जिनमें फि़ल्म पाकीज़ा के दर्जनों कस्ट्यूम रखे हैं। मीना कुमारी कमाल साहब से अलग हो गई हैं इसलिए इन दिनों फि़ल्म की शूटिंग बंद है। एक दिन मैं एक अल्मारी का ख़ाना खोलता हूँ, इसमें फि़ल्म में इस्तेमाल होने वाले पुरानी तरह के जूते-चप्पल और सैंडिल भरे हैं और उन्हीं में मीना कुमारी के तीन फि़ल्मफ़ेयर एवार्ड भी पड़े हैं। मैं उन्हें झाड़-पोंछकर अलग रख देता हूँ। मैंने ज़िंदगी में पहली बार किसी फि़ल्म एवार्ड को छुआ है। रोज़ रात को कमरा अंदर से बंद करके, वो ट्रॉफी अपने हाथ में लेकर आईने के सामने खड़ा होता हूँ और सोचता हूँ कि जब ये ट्रॉफी मुझे मिलेगी तो तालियों से गूँजते हुए हाल में बैठे हुए लोगों की तरफ़ देखकर मैं किस तरह मुस्कुराऊँगा और कैसे हाथ हिलाऊँगा। इसके पहले कि इस बारे में कोई फ़ैसला कर सकूँ स्टूडियो के बोर्ड पर नोटिस लगा है कि जो लोग स्टूडियो में काम नहीं करते वो कम्पाउंड में नहीं रह सकते। जगदीश मुझे फिर एक तरकीब बताता है कि जब तक कोई और इंतज़ाम नहीं होता हम लोग महाकाली की गुफाओं में रहेंगे (महाकाली अँधेरी से आगे एक इलाक़ा है जहाँ अब एक घनी आबादी और कमालिस्तान स्टूडियो है। उस ज़माने में वहाँ सिर्फ़ एक सड़क थी, जंगल था और छोटी-छोटी पहाडि़याँ जिनमें बौद्ध भिक्षुओं की बनाई पुरानी गुफाएँ थीं, जो आज भी हैं। उन दिनों उनमें कुछ चरस-गाँजा पीने वाले साधु पड़े रहते थे)। महाकाली की गुफाओं में मच्छर इतने बड़े हैं कि उन्हें काटने की ज़रूरत नहीं, आपके तन पर सिर्फ़ बैठ जाएँ तो आँख खुल जाती हैं। एक ही रात में ये बात समझ में आ गई कि वहाँ चरस पीए बिना कोई सो ही नहीं सकता। तीन दिन जैसे-तैसे गुज़ारता हूँ। बांदरा में एक दोस्त कुछ दिनों के लिए अपने साथ रहने के लिए बुला लेता है। मैं बांदरा जा रहा हूँ। जगदीश कहता है दो-एक रोज़ में वो भी कहीं चला जाएगा (ये जगदीश से मेरी आखि़री मुलाक़ात थी। आने वाले बरसों में ज़िंदगी मुझे कहाँ से कहाँ ले गई मगर वो ग्यारह बरस बाद वहीं, उन्हीं गुफाओं में चरस और कच्ची दारू पी-पीकर मर गया और वहाँ रहनेवाले साधुओं और आसपास के झोंपड़-पट्टी वालों ने चंदा करके उसका क्रिया-कर्म कर दिया-कि़स्सा ख़तम। मुझे और उसके दूसरे दोस्तों को उसके मरने की खबर भी बाद में मिली। मैं अकसर सोचता हूँ कि मुझमें कौन से लाल टँके हैं और जगदीश में ऐसी क्या ख़राबी थी। ये भी तो हो सकता था कि तीन दिन बाद जगदीश के किसी दोस्त ने उसे बांदरा बुला लिया होता और मैं पीछे उन गुफाओं में रह जाता। कभी-कभी सब इत्तिफ़ाक़ लगता है। हम लोग किस बात पर घमंड करते हैं)।
मैं बांदरा में जिस दोस्त के साथ एक कमरे में आकर रहा हूँ वो पेशावर जुआरी है। वो और उसके दो साथी जुए में पत्ते लगाना जानते हैं। मुझे भी सिखा देते हैं। कुछ दिनों उनके साथ ताश के पत्तों पर गुज़ारा होता है फिर वो लोग बंबई से चले जाते हैं और मैं फिर वहीं का वहीं-अब अगले महीने इस कमरे का किराया कौन देगा। एक मशहूर और कामयाब राइटर मुझे बुलाके ऑफ़र देते हैं कि अगर मैं उनके डॉयलॉग लिख दिया करूँ (जिन पर ज़ाहिर है मेरा नहीं उनका ही नाम जाएगा) तो वो मुझे छह सौ रुपये महीना देंगे। सोचता हूँ ये छह सौ रुपये इस वक़्त मेरे लिए छह करोड़ के बराबर हैं, ये नौकरी कर लूँ, फिर सोचता हूँ कि नौकरी कर ली तो कभी छोड़ने की हिम्मत नहीं होगी, ज़िंदगी भर यही करता रह जाऊँगा, फिर सोचता हूँ अगले महीने का किराया देना है, फिर सोचता हूँ देखा जाएगा। तीन दिन सोचने के बाद इनकार कर देता हूँ। दिन, हफ़्ते, महीने, साल गुज़रते हैं। बंबई में पाँच बरस होने को आए, रोटी एक चाँद है हालात बादल, चाँद कभी दिखाई देता है, कभी छुप जाता है। ये पाँच बरस मुझ पर बहुत भारी थे मगर मेरा सर नहीं झुका सके। मैं नाउम्मीद नहीं हूँ। मुझे यक़ीन है, पूरा यक़ीन है, कुछ होगा, मैं यूँ ही मर जाने के लिए नहीं पैदा हुआ हूँ- आखि़र नवम्बर 1969 में मुझे वो काम मिलता है जिसे फि़ल्मवालों की ज़बान में सही ‘ब्रेक’ कहा जाता है।
कामयाबी भी जैसे अलादीन का चिराग़ है। अचानक देखता हूँ कि दुनिया ख़ूबसूरत है और लोग मेहरबान। साल-डेढ़ साल में बहुत कुछ मिल गया है और बहुत कुछ मिलने को है। हाथ लगते ही मिट्टी सोना हो रही है और मैं देख रहा हूँ-अपना पहला घर, अपनी पहली कार। तमन्नाएँ पूरी होने के दिन आ गए हैं मगर ज़िंदगी में एक तनहाई तो अब भी है। सीता और गीता के सैट पर मेरी मुलाक़ात हनी ईरानी से होती है। वो एक खुले दिल की, खरी ज़बान की मगर बहुत हँसमुख स्वभाव की लड़की है। मिलने के चार महीने बाद हमारी शादी हो जाती है। मैंने शादी में अपने बाप के कई दोस्तों को बुलाया है मगर अपने बाप को नहीं (कुछ जख़्मों को भरना अलादीन के चिराग़ के देव के बस की नहीं-ये काम सिर्फ़ वक़्त ही कर सकता है)। दो साल में एक बेटी और एक बेटा, ज़ोया और फ़रहान होते हैं।
अगले छह वर्षों में एक के बाद एक लगातार बारह सुपरहिट फि़ल्में, पुरस्कार, तारीफ़ें, अख़बार और मैगज़ीनों में इंटरव्यू, तस्वीरें, पैसा और पार्टियाँ, दुनिया के सफ़र, चमकीले दिन, जगमगाती रातें-ज़िंदगी एक टेक्नीकलर ख़्वाब है, मगर हर ख़्वाब की तरह यह ख़्वाब भी टूटता है। पहली बार एक फि़ल्म की नाकामी-(फिल्में तो उसके बाद नाकाम भी हुईं और कामयाब भी मगर कामयाबी की वो खुशी और खुशी की वो मासूमियत जाती रही)।
18 अगस्त 1976 को मेरे बाप की मृत्यु होती है (मरने से नौ दिन पहले उन्होंने मुझे अपनी आखि़री किताब ऑटोग्राफ करके दी थी, उसपर लिखा था-‘जब हम न रहेंगे तो बहुत याद करोगे’। उन्होंने ठीक लिखा था)। अब तक तो मैं अपने आपको एक बाग़ी और नाराज़ बेटे के रूप में पहचानता था मगर अब मैं कौन हूँ। मैं अपने-आपको और फिर अपने चारों तरफ़, नई नज़रों से देखता हूँ कि क्या बस यही चाहिए था मुझे ज़िंदगी से। इसका पता अभी दूसरों को नहीं है मगर वो तमाम चीज़ें जो कल तक मुझे खुशी देती थीं झूठी और नुमाइशी लगने लगी हैं। अब मेरा दिल उन बातों में ज़्यादा लगता है जिनसे दुनिया की ज़बान में कहा जाए तो, कोई फ़ायदा नहीं। शायरी से मेरा रिश्ता पैदाइशी और दिलचस्पी हमेशा से है। लड़कपन से जानता हूँ कि चाहूँ तो शायरी कर सकता हूँ मगर आज तक की नहीं है। ये भी मेरी नाराज़गी और बग़ावत का एक प्रतीक है। 1979 में पहली बार शे’र कहता हूँ और ये शे’र लिखकर मैंने अपनी विरासत और अपने बाप से सुलह कर ली है। इसी दौरान मेरी मुलाक़ात शबाना से होती है। कैफ़ी आज़मी की बेटी शबाना भी शायद अपनी जड़ों की तरफ़ लौट रही है। उसे भी ऐसे हज़ारों सवाल सताने लगे हैं जिनके बारे में उसने पहले कभी नहीं सोचा था। कोई हैरत नहीं कि हम क़रीब आने लगते हैं। धीरे-धीरे मेरे अंदर बहुत कुछ बदल रहा है। फि़ल्मी दुनिया में जो मेरी पार्टनरशिप थी टूट जाती है। मेरे आसपास के लोग मेरे अंदर होने वाली इन तब्दीलियों को परेशानी से देख रहे हैं। 1983 में मैं और हनी अलग हो जाते हैं।
(हनी से मेरी शादी ज़रूर टूट गई मगर तलाक़ भी हमारी दोस्ती का कुछ नहीं बिगाड़ सकी। और अगर माँ-बाप के अलग होने से बच्चों में कोई ऐसी कड़वाहट नहीं आई तो इसमें मेरा कमाल बहुत कम और हनी की तारीफ़ बहुत ज़्यादा है। हनी आज एक बहुत कामयाब फि़ल्म राइटर है और मेरी बहुत अच्छी दोस्त। मैं दुनिया में कम लोगों की इतनी इज़्ज़त करता हूँ जितनी इज़्ज़त मेरे दिल में हनी के लिए है।)
मैंने एक कदम उठा तो लिया था मगर घर से निकल के कई बरसों के लिए मेरी ज़िंदगी ‘कटी उम्र होटलों में मरे अस्पताल जाकर’ जैसी हो गई। शराब पहले भी बहुत पीता था मगर फिर बहुत ही ज़्यादा पीने लगा। ये मेरी ज़िंदगी का एक दौर है जिस पर मैं शर्मिंदा हूँ। इन चंद बरसों में अगर दूसरों ने मुझे बर्दाश्त कर लिया तो ये उनका एहसान है। बहुत मुमकिन था कि मैं यूँ ही शराब पीते-पीते मर जाता मगर एक सवेरे किसी की बात ने ऐसा छू लिया कि उस दिन से मैंने शराब को हाथ नहीं लगाया और न कभी लगाऊँगा।
आज इतने बरसों बाद जब अपनी जिंदगी को देखता हूँ तो लगता है कि पहाड़ों से झरने की तरह उतरती, चटानों से टकराती, पत्थरों में अपना रास्ता ढूँढती, उमड़ती, बलखाती, अनगिनत भँवर बनाती, तेज़ चलती और अपने ही किनारों को काटती हुई ये नदी अब मैदानों में आकर शांत और गहरी हो गई है।
मेरे बच्चे ज़ोया और फ़रहान बड़े हो गए हैं और बाहर की दुनिया में अपना पहला क़दम रखने को हैं। उनकी चमकती हुई आँखों में आनेवाले कल के हसीन ख़्वाब हैं। सलमान, मेरा छोटा भाई, अमेरिका में एक कामयाब साइकोएनालिस्ट, बहुत-सी किताबों का लेखक, बहुत अच्छा शायर, एक मोहब्बत करने वाली बीवी का पति और दो बहुत ज़हीन बच्चों का बाप है। ज़िंदगी के रास्ते उसके लिए कुछ कम कठिन नहीं थे मगर उसने अपनी अनथक मेहनत और लगन से अपनी हर मंजि़ल पा ली है और आज भी आगे बढ़ रहा है। मैं ख़ुश हूँ और शबाना भी, जो सिर्फ़ मेरी बीवी नहीं मेरी महबूबा भी है। जो एक ख़ूबसूरत दिल भी है और एक क़ीमती ज़हन भी। ‘‘मैं जिस दुनिया में रहता हूँ वो उस दुनिया की औरत है’’-ये पंक्ति अगर बरसों पहले ‘मज़ाज़’ ने किसी के लिए न लिखी होती तो मैं शबाना के लिए लिखता।
आज यूँ तो ज़िंदगी मुझ पर हर तरह से मेहरबान है मगर बचपन का वो एक दिन, 18 जनवरी 1953 अब भी याद आता है। जगह, लखनऊ, मेरे नाना का घर-रोती हुई मेरी ख़ाला, मेरे छोटे भाई सलमान को, जिसकी उम्र साढ़े छह बरस है और मुझे हाथ पकड़ के घर के उस बड़े कमरे में ले जाती हैं जहाँ फ़र्श पर बहुत सी औरतें बैठी हैं। तख़्त पर सफ़ेद कफ़न में लेटी मेरी माँ का चेहरा खुला है। सिरहाने बैठी मेरी बूढ़ी नानी थकी-थकी सी हौले-हौले रो रही हैं। दो औरतें उन्हें संभाल रही हैं। मेरी ख़ाला हम दोनों बच्चों को उस तख़्त के पास ले जाती हैं और कहती हैं, अपनी माँ को आखि़री बार देख लो। मैं कल ही आठ बरस का हुआ था। समझदार हूँ। जानता हूँ मौत क्या होती है। मैं अपनी माँ के चेहरे को बहुत ग़ौर से देखता हूँ कि अच्छी तरह याद हो जाए। मेरी ख़ाला कह रही हैं-इनसे वादा करो कि तुम ज़िंदगी में कुछ बनोगे, इनसे वादा करो कि तुम ज़िंदगी में कुछ करोगे। मैं कुछ कह नहीं पाता, बस देखता रहता हूँ और फिर कोई औरत मेरी माँ के चेहरे पर कफ़न ओढ़ा देती है-
ऐसा तो नहीं है कि मैंने ज़िंदगी में कुछ किया ही नहीं है लेकिन फिर से ख़्याल आता है कि मैं जितना कर सकता हूँ उसका तो एक चौथाई भी अब तक नहीं किया और इस ख़्याल की दी हुई चुनौती जाती नहीं।

 

(साभारः– ‘तरकश’, लेखकःजावेद अख़्तर, राजकमल प्रकाशन; नई दिल्ली।)

 

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